मुंबई। शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार के निर्देशानुसार केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली की वित्तीय सहायता से मुंबादेवी आदर्श संस्कृत महाविद्यालय, भारतीय विद्याभवन तथा केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय क . जे . सोमैया परिसर के संयुक्त तत्वावधान में भारतीय बौद्धिक संपदा एवं सांस्कृतिक विरासत की विकास यात्रा के विविध विषयों पर चर्चा एवं व्याख्यान आयोजन किया गया यह एक दिवसीय संवाद भारतीय विद्या भवन कानजी खेटसेव सभागार चौपाटी पर हुआ। इस कार्यक्रम के उद्घाटन अवसर पर मुख्यातिथि के रूप में महाराष्ट्र के राज्यपाल भगतसिंह कोश्यारी ने कहा कि राष्ट्र का विकास हवाई जहाज, सड़क मार्ग, बिजली, स्वास्थ्य, शिक्षा और आर्थिक भौतिक संसाधन से जोड़कर देखा जाता है, किंतु यह किसी भी राष्ट्र का भौतिक विकास तो हो सकता है। लेकिन वास्तविक विकास शरीर, मन और आत्मा का होता है। जिसको विकसित करने के लिए शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार ने जो अभियान चलाया है, वह सराहनीय है।

इस संवाद से भारत के युवा पीढ़ी में सभ्यता और संस्कृति के प्रति पुनर्जागरण होगा। जहां विश्व के बहुत से विकसित देशों का पतन होता दिख रहा है, वहीं पर भारत अपनी सभ्यता और संस्कृति के बल पर विश्व का फिर से जगद्गुरू बनते दिखाई दे रहा है। हमारी सभ्यता और संस्कृति की रक्षा एवं विकसित करने की शक्ति संस्कृत भाषा में है। महामहिम ने यह भी कहा कि छत्रपति शिवाजी महाराज, महाराणा प्रताप, सरदार भगत सिंह, महात्मा गांधी जैसे महापुरुषों ने भारत के स्वाभिमान की रक्षा की है। हम भारतीयों को भी अपनी सभ्यता, संस्कृति एवं स्वाभिमान के लिए कर्तव्यनिष्ठता का परिचय देना चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि जिस तरह काशी और अयोध्या कॉरीडोर में विकसित किया गया, उसी तरह पंचवटी त्र्यंबकेश्वर के लिए भी कॉरीडोर बनना चाहिए। इस अवसर पर सम्मानित अतिथि के रूप में ब्रह्मचारी अभिषेक ने कहा कि गंगा की सफाई, काशी उज्जैन, अयोध्या, विंध्याचल जैसे तीर्थ स्थानों का कॉरीडोर बनाकर भारत ने विश्व को संदेश दिया कि 21 वीं सदी का भारत आज भी अपनी सभ्यता एवं संस्कृति के प्रति श्रद्धा एवं विश्वास रखता है, जिसके परिचय से दुनिया के लोग भारत को जानते हैं, जिसका श्रेय भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जाता है।

सम्मानित अतिथि के रूप में युवा चेतना मंच के राष्ट्रीय संयोजक रोहित कुमार सिंह ने कहा कि मुगल शासक औरंगजेब ने हमारे सनातनी मठ – मंदिरों को तोड़ा, तो विगत 8 वर्षों में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन मठ – मंदिरों का जीर्णोद्धार करके आततायी शक्तियों को बता दिया, कि भारत की सभ्यता एवं संस्कृति को कोई भी नहीं मिटा सकता है।

विकासयात्रा संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए केंद्रीय विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेडी ने कहा कि आजादी के अमृत काल में विकास यात्रा भारतीय ज्ञान परंपरा, सभ्यता एवं संस्कृति के क्षेत्र में हजारों संस्थाओं को जोड़कर शुरू किया गया है, जो ऋषि मुनियों के ज्ञान परंपरा, संस्कृति एवं तपस्या का परिणाम है। भारत की अखंडता एक राष्ट्र के रूप में दासत्व से ज्ञानतत्व तक का सफर 21 वीं सदी में नया भारत का संदेश देता है। राममंदिर, काशी विश्वनाथ, मथुरा, उज्जैन आदि हमारे सभ्यता एवं संस्कृति के राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक राष्ट्र की धरोहर हैं, जिसे वर्तमान युवा पीढ़ी को समझना और आत्मसात करना होगा, तभी 21 वीं सदी का भारत विश्व का गुरू बनेगा।

समापन अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में एस, एन. डी. टी. महिला विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. उज्ज्वला चक्रदेव ने कहा कि छत्रपति शिवाजी महाराज, महाराणा प्रताप, लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी, सुभाषचंद्र बोस का अपना लक्ष्य बहुत पहले से निर्धारित था, वैसे ही युवा पीढ़ी को अपने जीवन का लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए।

इस अवसर पर संस्कृत एवं शोध केन्द्र भारतीय विद्याभवन के निदेशक डॉ. गिरीश जानी ने स्वागत भाषण में कहा कि, विकास यात्रा शरीर के मन से शुरू होती है, जो लक्ष्य तक पहुंचती है। संवाद गोष्ठी के समापन अवसर की अध्यक्षता करते हुए केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, क. जे. सोमैया परिसर के निदेशक प्रो. लक्ष्मी निवास पांडेय ने कहा कि भारत की सभ्यता और संस्कृति को बहुत सी विदेशी ताकतों ने मिटाने का प्रयास किया, किंतु भारत माता की भूमि में यह संस्कार है, कि जिसने भी मिटाने की कोशिश की वह खुद मिट गया। धन्यवाद एवं मंच संचालन मुंबादेवी आदर्श संस्कृत महाविद्यालय के प्रभारी प्राचार्य एवं कार्यक्रम के संयोजक डॉ. गणपति हेगडे ने किया। इस अवसर पर कई संस्थाओं के विशेषज्ञ, प्राध्यापक, कर्मचारी एवं छात्र भी उपस्थित थे।

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