क्या यह महज इत्तफाक है या सत्ताधीसों का बुना जाल ?

क्या यह महज इत्तफाक है या सत्ताधीसों का बुना जाल ?

श्यामजी मिश्रा

  1. एक ओर जहां पूरा विश्व कोरोना वायरस से लड़ने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ हमारे देश में इस महामारी से बचने के लिए कम और राजनीति करने में ज्यादा व्यस्त हैं। देश में लगातार कोरोना के मरीजों की संख्या में इजाफा हो रहा है। इस संकट की घड़ी में पक्ष और विपक्ष को एकजुट होकर इस कोरोना जैसी महामारी से लड़ाई लड़ना चाहिए था न कि एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप। शुरुआत में तो अपने देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में लॉकडाउन कर जनता से खूब थाली बजवाई और दीपक भी जलवाये और लोगों से अपील की कि आप सब घर पर ही रहें, आप लोगों की देखभाल सरकार करेगी, आप चिंता न करें, सरकार आपकी चिंता करेगी। देश में कोई भी व्यक्ति भूखा न सोए इसके लिए पर्याप्त व्यवस्था की गयी है। अपने इन्हीं प्रवचन की वजह से पूरे विश्व में सूर्खियां बंटोरी और इसका फायदा भी हुआ। कोरोना वायरस से लड़ने के लिए विश्व बैंक से भारत सरकार को एक मिलियन डालर का कर्ज भी मिला। इसके अलावा प्रधानमंत्री राहत कोष में भी रूपयों की बरसात हुई। प्रधानमंत्री ने भी देश के लोगों के लिए करोड़ों रुपये के पैकेज का ऐलान तो कर दिया। परंतु क्या उन गरीब श्रमिकों व जरूरतमंदों को इसका फायदा मिला या मिलेगा ? देश के बेबस, लाचार श्रमिकों का लॉकडाउन के बाद उनकी जिंदगी बद से बदतर हो गई है। अब श्रमिकों को लेकर राजनीति गर्मा गई है। एक तरफ सूर्य की गर्मी और दूसरी तरफ राजनीति की गर्मी। इन दोनों की गर्मी से श्रमिक बेचारे पिघल रहे हैं। अपने देश के नेता व पूंजीपतियों को ऐसा लगता है कि जैसे येे सभी श्रमिक हिंदुस्तान के नहीं बल्कि किसी अन्य देश से हजारों की संख्या में आकर अपने देश के सड़कों पर झुंड बनाकर घूम रहे हैं। अब इन श्रमिकों को लेकर टीवी चैनलों पर अपने देश के नेता बहस कर रहे हैं और एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं कि ये आपकी गलती है जो मजदूर आज सड़कों पर विचरण कर रहे हैं, वो आपकी गलती है। अरे भाई आज जिस सिंहासन पर बैठेे हो और जो पूंजीपति अपने महलों में आनंद उठा रहे हैं, वो इन्हीं मजदूरों की देन है। कुछ तो शर्म करो आज जो कुुुछ भी हो इन्हीं की बदौलत हो।
    देश में अब एक अलग तरह की राजनीति चल रही है। देश में राजनीतिक उथल-पुथल के कई दौर देखने को मिले हैं। लेकिन इन दिनों राजनीतिक हालात में जो नई प्रवृत्ति पनपी है, वह कई सवालों को जन्म देती है। सही और गलत के फासले को तय करने का पैमाना आखिर क्या हो ? आज दो विचारधाराओं की लड़ाई में सच कहीं खोता नजर आ रहा है और झूठ तेजी से फैल रहा है। बदलते राजनीतिक दौर में हम किसी न किसी के अनुयायी या यूँ कहें कि अंध भक्ति के शिकार होते जा रहे हैं। किसी ने सरकार की प्रशंसा की और उसके काम-काज को सराहा तो वह सरकार का वफादार कहलाने लगा और अगर किसी ने सत्ता के खिलाफ आवाज उठाई तो वह देश द्रोही, पाकिस्तानी, आतंकवादी और न जाने क्या क्या हो जाता है ! क्या यह महज इत्तफाक है या सत्ताधीसों का बुना जाल ? आज देश में कोई बेदाग नहीं है, इल्ज़ाम सबके सिर पर है।
    आज कोरोना संकट ने एक नई स्थिति पैदा कर दी है। लाखों लोग अपने गांव जाना चाहते हैं । उन्हें शहरों में रोककर रखने की भरसक कोशिश की गई, लेकिन ये रूके तो कैसे रूके ? अगर रूके तो रहें कहाँ ? जिस मकान में रह रहे थे, मकान मालिक भाड़े के लिए परेशान कर रहा था, और मकान मालिक भी क्या करे, जिसका रोजी-रोटी इसी पर निर्भर है। दो महीने तक तो किसी तरह जी खा लिए उसके बाद क्या ? साहेब ने तो कह दिया था कि अपने अपने क्षेत्र के एमपी, एमएलए और नगरसेवक अपने अपने क्षेत्रों में लोगों की देखभाल करें, उन्हें राशन व खाना मुहैया करायें, लेकिन जरा पूछिए अपने शाहजादों से कि लॉकडाउन के दौरान घर से बाहर कभी निकले हैं क्या ? जिस तरह से चुनाव के दौरान घर घर जाकर वोट की भीख मांगते हैं क्या उसी तरह घर घर जाकर किसी को राशन पहुंचाया है क्या ? इसके लिए इनके पास समय कहां है ? लॉकडाउन में फंसे हुए श्रमिक इन्हें सैलानी लगते हैं, अरे ऐसा बोलने से पहले डूब मरते तो अच्छा था। वो तो भला हो उन सामाजिक संगठनों का जिन्होंने ने लोगों को भोजन व अनाज के किट्स वितरित किए, नहीं तो आज जितना कोरोना से लोग मरे हैं, उससे कहीं ज्यादा लोग भूख से मर जाते। लोग कोरोना संक्रमण और मौत के काउंट डाउन के बीच अपने भविष्य को लेकर फिक्रमंद जरूर हैं।
    मुंबई एवं गुजरात के बार्डर से हज़ारों मजदूर अपने गांव की तरफ निकल गए हैं। कोई पैदल गया, तो कोई सायकल से, तो कोई अपना रिक्शा ही लेकर निकल पड़ा, यहां तक कि जिसको जो भी साधन मिला उससे गया। इसमें से बहुत मजदूर ऐसे भी थे जिनकी जेब में न तो पैसे थे और न ही घर पहुंचने के बाद खाने के लिए राशन। जिन कंपनियों में ये सभी मजदूर काम करते थे, वे सभी कंपनियों के ठेकेदार इन मजदूरों का पगार भी नहीं दिया। नंगे पैर भूखे-प्यासे समूहों में पीड़ा से कराहते हुए ये लोग निकल पड़े। रात हो या दिन केवल इस विश्वास के साथ कि उन्हें किसी तरह अपने घर पहुंचना है। किसी तरह सरकार ने श्रमिक स्पेशल ट्रेनें चलाई और इन श्रमिकों को लेकर ट्रेनें चली भी लेकिन वो भी रास्ता भटक गईं हैं। कई दिनों से लोग भूख-प्यासे ट्रेनों में ही फंसे हुए हैं। रेलवे की इतनी बड़ी लापरवाही समझ से परे है। अभी भी लाखों की संख्या में लोग और भी हैं जो घर जाना चाहते हैं। ये सभी मजदूरों के पास किराए के घर में बैठकर कोरोना वायरस से जंग जीतने के लिए कोई विकल्प नहीं है। लेकिन अब इन मजदूरों को लेकर भी राजनीति शुरू हो गई है। महाराष्ट्र में तो लोगों का तो बुरा हाल है। लोग गांव जाना चाहते हैं लेकिन केंद्र और राज्य सरकारों के बीच आरोप-प्रत्यारोप के बीच में फंसे हुए हैं।
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Shyamji Mishra Editor

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