यह देश अंबानियों और अडानियों का नहीं है, न ही शोषण-हिंसा और गुलामी को पैदा करने वालों व सहने वालों का है, होना भी नहीं चाहिए। हमें याद रखना चाहिए कि महात्मा गांधी ने क्या कहा था – जो कौम गुलाम बनने से इंकार करती है, उसे कोई गुलाम नहीं बना सकता, यह देश गांधी का देश है। यह देश प्रबुद्धों-संबुद्धों का देश है। यह देश द्रष्टाओं का है, जिंदा लोगों का देश है। यही तो कारण है कि भारत इस संपूर्ण धड़कते हुए अस्तित्व का हृदय है। जिंदा कौमों को कोई गुलाम नहीं बना सकता और ध्यान रखें जिंदा कौमे ही लोकतंत्र को जिंदा रख पाती हैं। लेकिन वर्तमान समय में जो हरियाणा और महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव हुए और सरकार बनाने के लिए बंटवारा या लेन देन का माहौल बना और बन रहा है, क्या यह लोकतांत्रिक है ? हरियाणा में तो भाजपा और जेजेपी (जननायक जनता पार्टी ) के बीच सत्ता समझौता हुआ और सरकार बन गई। लेकिन अब महाराष्ट्र में कांग्रेस व राष्ट्रवादी कांग्रेस भाजपा-शिवसेना गठबंधन की साफ-सुथरी सरकार बनने में बाधा डाल रहे हैं। कांग्रेस ने अकारण आफर या लालच दिया है, राष्ट्रवादी के नेता शरद पवार कभी विपक्ष में बैठने की बात करते हैं और कभी शिवसेना को आब या डिग्निटी-गरिमा के नाम पर भड़का रहे हैं और वहीं शिवसेना प्रवक्ता संजय राऊत ने राकपा प्रमुख शरद पवार के घर जाकर मुलाकात भी की। जबकि देखा जाये तो शिवसेना की सीटें बीजेपी से आधी है, मगर महत्वाकांक्षा है कि उसे पूरी सत्ता यानी मुख्यमंत्री पद मिले। यह गठबंधन या पोलीटिकल ब्लैकमेलिंग ? कांग्रेस – राष्ट्रवादी की बीजेपी से ऐसी नफरत है तो एक अलोकतांत्रिक बैसाखी पर खड़ी सरकार बनेगी जो पांच चलेगी भी इसमें आशंका है। छोटी पार्टियों को स्वीकार करना चाहिए कि सत्ता में बंटवारे का अनुपात जनादेश के हिसाब से होना चाहिए। पोलिटिकल ब्लैकमेलिंग ही यदि लोकतंत्र है तो फिर जनादेश की फार्मेलिटी का भी अर्थ क्या है ?

भाजपा की उपलब्धि देखें तो पिछली बार 260 सीटों पर वह चुनाव लड़ी व 47% यानी 122 सीटें जीती। इस बार सिर्फ 164 सीटों पर वह लड़ी व 105 सीटें जीती यानी 65% सफलता उसे मिली। यदि वह 260 सीटों पर लड़ी होती तो उसे 166 सीटें मिलती, यानी वह 145 सीटों का बहुमत अकेले पार कर जाती और उसे वोट भी सभी पार्टियों से ज्यादा यानी 44.47% मिले होते, इसलिए सत्ता की स्थापना का हक उसे ही है। यदि शिवसेना ने 6% वोट कम पाकर भी सीएम पद शिवसेना मांग रही है तो क्या यह लोकतंत्र का मजाक नहीं होगा ? शिवसेना में पोस्टर वार चल रहा था कि सीएम आदित्य ठाकरे को बनाया जाये, लेकिन विधायक दल की बैठक में जब एकनाथ शिंदे को विधायक दल का नेता चुना गया तो आदित्य ठाकरे के मुख्यमंत्री बनने पर विराम लग गया। लेकिन शिवसेना अभी भी सीएम पद के लिए ताल ठोक रही है। वैसे देखा जाए तो यदि बीजेपी अकेली चुनाव लड़ती तो आज वह अकेली सरकार बनाने में समर्थ होती। क्या ऐसा समझा जाए कि बीजेपी ने यह गलती कर दी ? वहीं कांग्रेस को तो 33% से कम वोट मिले हैं, जबकि राष्ट्रवादी को 38%, ये आंकड़े इन पार्टियों द्वारा लड़ी गई सीटों के आधार है, सभी 288 सीटों को पकड़ें तो बीजेपी करीब 26% वोटों के साथ बहुत आगे है, जबकि शिवसेना, राष्ट्रवादी व कांग्रेस 16-17% तक ही सिमट गए या बीजेपी से 9-10% कम वोट ही पा सके है।

खैर अब जानते हैं कि महाराष्ट्र में नई विधानसभा में प्रत्येक विधायक की औसत आय क्या है ? इस विधानसभा में प्रत्येक विधायक की औसत संपत्ति 22 करोड़ रूपए है, यानी 288 एमएलए की संपत्ति 4100 करोड़ रूपए से ज्यादा है, इनमें सर्वाधिक अमीर भाजपा के एमएलए है, जिनकी औसत संपत्ति 27.5 करोड़, कांग्रेस की 24.5 करोड़, एनसीपी 15 करोड़ व शिवसेना के विधायकों की औसत संपत्ति 14 करोड़ की है। आश्चर्य होता है न एक आम-ईमानदार मतदाता या हमारे जैसे लोग जो लोकतंत्र की मीठी बातों में फंसते हैं, अमीरों- नेताओं – दलालों – गुरूओं द्वारा शोषित हैं, करोड़ रुपए जीवन भर देख तक नहीं पाते, कमाने की बात तो दूर है। कैसे करोड़ों रुपये की संपत्ति लोग बना लेते हैं ? आश्चर्य है, दरअसल क्या ये सभी लुटेरे हैं ? ऐसा सवाल लोगों के मन उठता है। इन्हें धरती में गाड़ना ही विषमता को नष्ट करने का मार्ग दिखाई पड़ता है। ऐसा लगता है कि इन्हें किसी भगवान-धर्म से डर नहीं लगता। सरकार इनको संरक्षण देती है, जनता का वोट लेती है और काम इन जैसे लुटेरों की करती है। इस राज्य में इस व्यवस्था का अंत होना चाहिए, मानवता के इन लुटेरों का हिंद महासागर इंतजार कर रहा है, पता नहीं कब मानवता में, इस कायर-क्लीव-गुलाम समाज में वह ताकत आएगी कि वह इन लुटेरों को उठाकर समुद्र में फेक दे या स्पेस में छोड़ दे। हर साल इनकी संपत्ति बीसों लाख करोड़ रूपये बढ़ कैसे जाती है ? क्या विषमता नष्ट करने के लिए अवतार ही चाहिए। उठो, जागो और समता के समाज की स्थापना के लिए इन लुटेरों से निर्णायक संघर्ष करो ! लोकतंत्र यही है, जो मनुष्य के लुटेरों को इतना नीचे गाड़ दे कि वे कभी सिर न उठा सकें। हमारा देश बहुदलीय संसदीय गणतंत्र का देश है, हर व्यक्ति की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का लोकतंत्र मंच है। चुनाव लड़ने का अधिकार बुनियादी अधिकारों में से एक है, मगर इसका कुछ लोग दुरूपयोग करते हैं, जो अब बंद होना चाहिए।

 

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