दहेज के कलंक और दहेज रूपी सामाजिक बुराई को केवल कानून के भरोसे नहीं रोका जा सकता

निंबाराम के पुरोहित – उप संपादक – स्टार मीडिया न्यूज

भारत में दहेज एक पुरानी प्रथा है । मनुस्मृति में ऐसा उल्लेख आता है कि माता-कन्या के विवाह के समय दाय भाग के रूप में धन-सम्पत्ति, गउवें आदि कन्या को देकर वर को समर्पित करें ।यह भाग कितना होना चाहिए, इस बारे में मनु ने उल्लेख नहीं किया । समय बीतता चला गया स्वेच्छा से कन्या को दिया जाने वाला धन धीरे-धीरे वरपक्ष का अधिकार बनने लगा और वरपक्ष के लोग तो वर्तमान समय में इसे अपना जन्मसिद्ध अधिकार ही मान बैठे हैं । अखबारों में अब विज्ञापन निकलते है कि लड़के या लडकी की योग्यता इस प्रकार है। उनकी मासिक आय इतनी है और उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि बहुत सम्माननीय है । ये सब बातें पढ़कर कन्यापक्ष का कोई व्यक्ति यदि वरपक्ष के यहां जाता है तो असली चेहरा सामने आता है । वरपक्ष के लोग घुमा-फिराकर ऐसी कहानी शुरू करते हैं जिसका आशय निश्चित रूप से दहेज होता है । दहेज-दानव को रोकने के लिए सरकार द्वारा सख्त कानून बनाया गया है । इस कानून के अनुसार दहेज लेना और दहेज देना दोनों अपराध माने गए हैं । अपराध प्रमाणित होने पर सजा और जुर्माना दोनों भरना पड़ता है । यह कानून कालान्तर में संशोधित करके अधिक कठोर बना दिया गया है ।किन्तु ऐसा लगता है कि कहीं-न-कहीं कोई कमी इसमें अवश्य रह गई है; क्योंकि न तो दहेज लेने में कोई अंतर आया है और न नवयुवतियों द्वारा की जाने वाली आत्महत्याओं अथवा उनकी हत्याओं में ही कोई कमी आई है । दहेज संबंधी कानून से बचने के लिए दहेज लेने और दहेज देने के तरीके बदल गए हैं । वरपक्ष के लोग शादी से पहले ही एक मोटी रकम कन्यापक्ष वालों से ऐंठ लेते हैं । जहां तक सामान का सवाल है रंगीन टीवी, सोफा सेट, अलमारी, डायनिंग टेबल, घड़ी, अंगूठियां-ये सब चीजें पहले ही वर पक्ष की शोभा बढ़ाने के लिए भेज दी जाती हैं या शादी के समय दी जाती है । बाकी बचती हैं ज्योनार उसमें खा-पीकर लोग चले जाते हैं । शुरू-शुरू में वर एवं कन्यापक्ष दोनों में मेलभाव होता है, अतएव दोनों से पूरी सतर्कता बरती जाती है । यदि सब कुछ खुशी-खुशी चलता रहा, तब तो सब गुप्त रहता है अन्यथा कोई दुर्घटना हो जाने पर सब रहस्य खुल जाते हैं । कन्या अथवा कन्यापक्ष के लोगों में यह हिम्मत नहीं होती कि वे लोग ये सुनिश्चित कर लें कि शादी होगी तो बिना दहेज अन्यथा शादी ही नहीं होगी।

दहेज के कलंक और दहेज रूपी सामाजिक बुराई को केवल कानून के भरोसे नहीं रोका जा सकता । इसके रोकने के लिए लोगों की मानसिकता में बदलाव लाया जाना चाहिए । इसी दहेज के चलते ऐसी कई लड़के-लड़कियों ने अपनी जाति परंपरा को तोड़ते हुए अंन्तर्राजातीय विवाह कर चुके हैं, जिन्हें आज भी समाज उन्हें हेयदृष्टि से देखता है। आज इसी दहेज रूपी दानव की वजह से अंन्तर्राज्यीय, अन्तर्प्रान्तीय और अन्तर्राष्ट्रीय विवाहों का प्रचलन शुरू हो गया है, यदि कभी इसमें और लोकप्रियता आई और सामाजिक प्रोत्साहन मिलता रहा, तो ऐसी आशा की जा सकती है कि दहेज लेने की प्रथा में कमी जरूर आएगी, और धर्म व समाज के ठेकेदार देखते रह जायेंगे। अगर सरकार भी चाहे तो इस प्रथा को समूल नहीं तो आंशिक रूप से जरूर खत्म कर सकती है । सरकार उन दम्पतियों को रोजगार देने अथवा धंधों में ऋण देने की व्यवस्था करे, जो बिना दहेज के विवाह करना चाहते हों या किया हो । अत: आवश्यकता है कि सरकार अपने कर्तव्य का पालन करे और सामाजिक जागृति लाए, तो दहेज का कलंक दूर हो सकता है । दहेज प्रथा को समाप्त करने के लिए तत्काल कदम उठाने की जरूरत है । आजकल यह प्रथा व्यवसाय का रूप लेने लगी है । मां-बाप चाहते हैं कि बच्चे को पढ़ाने-लिखाने और उसे लायक बनाने के लिए उन्होंने जो कुछ खर्च किया है, वह लड़के का विवाह करके वसूल कर लेना चाहिए । इंजीनियर, डॉक्टर अथवा आई.ए.एस. लड़कों का दहेज पचास लाख से एक करोड़ रुपये तक पहुंच गया है । बताइए एक सामान्य गृहस्थ इस प्रकार का खर्च कैसे उठा सकता है। वर्तमान परिस्थितियों में उचित यही है कि ऐसे सभी लोग एक मंच पर आवें, जो दहेज को मन से निकृष्ट और त्याज्य समझते हों । वे स्वयं दहेज न लें तथा दहेज लेने वालों के खिलाफ आवाज उठाएं । यदि वे ऐसा समझते हों कि उनके काम का विरोध होगा, तो वे अपने सद्उद्देश्य के लिए सरकार से मदद भी मांग सकते हैं । कुछ साल तक यदि समग्र देश में दहेज विरोधी आन्दोलन चलाया जाए, तभी इस कुप्रथा को मिटाना संभव बन पाएगा । अन्यथा, अन्य कोई सूरत ऐसी दिखाई नहीं पड़ती जो इस अमानवीय कुप्रथा को समाप्त कर सके ।

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